डॉ. उमेश्वर पाण्डेय
दिल की बातें – सीधे दिल से
नमस्कार। रोज़ क्लिनिक में मरीज़ मुझसे जो सवाल पूछते हैं, सोचा वही आपसे साझा करूँ – वैसे ही, जैसे कुर्सी पर बैठकर बात करते हैं। चाय जैसी गरम और सीधी। पढ़िए, और जो काम का लगे, अपने घरवालों को ज़रूर भेजिए। दिल की बात है- अकेले रखने की चीज़ नहीं।
ये सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी है। सच बताऊँ? दिल बेचारा महीनों पहले से इशारे देता रहता है – हम ही नहीं सुनते। वो बोलता रहता है, “भई, ज़रा ध्यान दो,” और हम कहते हैं “अरे उम्र हो गई है, ऐसा तो होता ही है।”
तीन इशारे जो लोग टाल देते हैं- सीढ़ी चढ़ते वक़्त साँस फूलना जो पहले नहीं होती थी, बिना किसी काम के थकान, और जबड़े या बाएँ हाथ में हल्का भारीपन। ये उम्र नहीं है साहब, ये आपका दिल बात कर रहा है। सुन लीजिए। अगर ऐसा कुछ है, तो टालिए मत – डॉक्टर को दिखाइए।
(हँसी आती है मुझे ये सुनकर, क्योंकि दिन में दस बार सुनता हूँ!) इसी डर से आधे लोग इलाज ही शुरू नहीं करते। भई, BP की दवा कोई नशा नहीं है कि लत लग जाएगी। वो चुपचाप आपको लकवे (stroke) और हार्ट अटैक से बचाती रहती है।
और एक खुशख़बरी – अगर आप नमक कम कर दें, रोज़ टहलें, थोड़ा वज़न घटाएँ, तो बहुत लोगों की दवा कम भी हो जाती है। पर हाँ, एक विनती – दवा अपने मन से कभी बंद मत कीजिए। डॉक्टर से पूछे बिना नहीं। डर से नहीं, समझदारी से इलाज कीजिए।
वाह, बढ़िया सवाल! देखिए, मैं एक बात कहूँ- हम अपनी गाड़ी की सर्विसिंग टाइम पर करा लेते हैं, स्कूटर का इंश्योरेंस याद रखते हैं, पर अपने दिल की कभी जाँच नहीं कराते। जबकि दिल की एक ही गाड़ी मिली है — कोई स्पेयर पार्ट नहीं आता!
40 के बाद साल में एक बार BP, शुगर और कोलेस्ट्रॉल की जाँच हर किसी को करानी चाहिए – तकलीफ़ हो या न हो। क्योंकि दिल की बीमारी बड़ी बेअदब है, बिना बताए चली आती है। तो साल में एक बार, अपने दिल का भी “हाल-चाल” पूछ लीजिए।
दो तरह के लोग मुझे रोज़ मिलते हैं। एक जो घी को छूते ही नहीं, जैसे वो दुश्मन हो। दूसरे जो कहते हैं “देसी घी तो अमृत है साहब!” और कटोरी भर के पी जाते हैं। दोनों ग़लत हैं!
सच बीच में है। घर का थोड़ा घी – रोज़ एक-दो चम्मच नुक़सान नहीं करता। दुश्मन है ज़्यादा तेल, बार-बार गरम किया हुआ तेल, और बाहर का तला-भुना। मात्रा सब कुछ है। कड़ाही भर के नहीं, चम्मच भर के – समझ गए ना?
ये सवाल जान बचा सकता है, इसलिए ध्यान से पढ़िए। एक छोटा सा नियम याद रखिए: गैस आमतौर पर खाने से जुड़ी होती है, डकार आने पर आराम मिल जाता है। पर दिल का दर्द – वो चलने या मेहनत करने पर बढ़ता है, आराम करने पर कम होता है, पसीना आ सकता है, और बाएँ हाथ या जबड़े तक जा सकता है।
एक मरीज़ थीं मेरी – महीनों एंटासिड खाती रहीं, सोचा गैस है। पूछा तो पता चला, चलने पर भी जलन होती थी। ECG किया – वो गैस नहीं, दिल था। ख़ासकर महिलाओं में दिल की तकलीफ़ अक्सर “गैस” जैसी लगती है, इसलिए छूट जाती है। नियम याद रखिए – अगर दर्द मेहनत पर बढ़े, तो उसे गैस मानकर घर मत बैठिए। तुरंत डॉक्टर के पास जाइए। गलत अलार्म चलेगा, देर नहीं।
अरे घंटों कौन कह रहा है! बस 30 मिनट, हफ़्ते में पाँच दिन। और तेज़ चलिए – इतना कि हल्की साँस चढ़े पर बात कर सकें। एक साथ टाइम न मिले तो सुबह 15, शाम 15 – हिसाब बराबर।
न महँगा जिम चाहिए, न नए जूते, न कोई बहाना। बस घर के बाहर निकलिए और चल पड़िए। यक़ीन मानिए – दिल के लिए इससे सस्ता और बढ़िया इलाज पूरी दुनिया में नहीं बना। मुफ़्त की दवा है, ले लीजिए!
अंत में, दिल से एक बात —
आपका दिल सिर्फ़ आपका नहीं है। वो आपकी पत्नी का है, बच्चों का है, उन पोते-पोतियों का है जिनके साथ अभी बहुत खेलना बाक़ी है। हम लोग - ख़ासकर मर्द - अपनी सेहत को हमेशा सबसे आख़िर में रखते हैं। पर अपने दिल का ख़याल रखना स्वार्थ नहीं है साहब - वो अपने परिवार से प्यार है। तो आज एक छोटा सा वादा कीजिए — अपने लिए। इस महीने एक बार BP ज़रूर चेक कराएँगे। बस इतना सा।
स्वस्थ रहिए, मुस्कुराते रहिए।
आपका अपना, डॉ. उमेश्वर पाण्डेय
Guidelines for Patients of Hypertension